दंबग माने जाने वाले प्रभुनाथ सिंह ने आखिरकार लालू प्रसाद का दामन थाम लिया. कभी धुर लालू के विरोधी रहे प्रभुनाथ सिंह ने नई दोस्ती के लिए अगस्त क्रांति दिवस को चुना था. दोनों के मिलन के गवाह बने सारण क्षेत्र के हजारों लोग जो किसान महापंचायत में शामिल होने के लिए आए थे. लेकिन सवाल ये उठता है कि राजनीति में ये बेमेल जोड़ आखिर क्या गुल खिलाएगा. आखिर लालू में आस्था व्यक्त करनेवाले प्रभुनाथ सिंह किस तरह से आरजेडी के लिए वोट मांगेंगे. सवाल ये कि...ये रिश्ता क्या कहलाएगा.
बिहार की राजनीति में भी इसकी चर्चा हो रही है. प्रभुनाथ सिंह खुद के आरजेडी में शामिल होने को जनता की आवाज़ बता रहे हैं. लेकिन वास्तव में क्या ऐसा है. तो जवाब मिलता है. नहीं. क्योंकि प्रभुनाथ सिंह जिस तेवर के नेता माने जाते हैं. उसमें इसकी गुंजाइश काफी कम है. हालांकि सारण इलाके में उनका खासा वर्चस्व है और इसका असर भी बिहार विधानसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है. लेकिन लालू और प्रभुनाथ की दोस्ती बहुत दिनों तक चल पाएगी.
आखिर ये सवाल क्यों उठ रहा है. कि लालू-प्रभुनाथ की दोस्ती बेमेल है. तो इसके पीछे एक वजह है. दोनों के अपने राजनीतिक सरोकार. प्रभुनाथ सिंह अभी तक अपनी शर्तों पर राजनीति करते आए हैं. इसको लेकर उनकी आलोचना भी होती रही है और वो किसी बात को बहुत बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं. इस बारे में भी लोग जानते हैं. जबकि लालू की राजनीति इससे बिल्कुल अलग है. वो आरजेडी में नेताओं को अपनी शर्तों पर रखते हैं और जो भी इससे सहमत नहीं होता है. वो या तो खुद अलग हो जाता है या हासिए पर चला जाता है. शिवानंद तिवारी इसके अच्छे उदाहरण हैं. जिन्होंने आरजेडी में दोनो दौर देखे हैं. फिलहाल वो जेडीयू में हैं.
ऐसे में लालू और प्रभुनाथ का साथ चुनावी फायदे के लिए जरूर दिखता है. अगर चुनाव में सफलता मिलती है. तो दोनों नेता कुछ दिनों तक साथ चल सकते हैं. और अगर चुनाव में आपेक्षित लाभ नहीं मिला. तो इस दोस्ती का हश्र क्या होगा. इसका अंदाजा बहुत आसानी से लगाया जा सकता है. यही नहीं लालू प्रसाद से दोस्ती की बात करें. तो बड़े भाई-छोटे भाई के रूप में बिहार चुनाव में उतरने की तैयारी कर रहे पासवान से उनकी दोस्ती पर ग्रहण लगा हुआ है. इसका हश्र क्या होगा. इसको लेकर सवाल उठने लगे हैं. क्योंकि पासवान ने खुद को उस महापंचायत से दूर रखा. जिसमें उन्हें लालू प्रसाद के साथ जाना था. और इस दूरी की वजह सीट बटवारे को लेकर उपजा विवाद माना जा रहा है.
पासवान का मामला तो ताजा है. अगर इतिहास की बात करें. तो लालू प्रसाद बिहार की सत्ता में आने के बाद वामदलों और कांग्रेस जैसी पार्टियों से दोस्ती कर चुके हैं. लेकिन किसी भी भी राजनीति लालू से दोस्ती के बाद सिरे नहीं चढ़ पाई. दहाई में रहनेवाले वामदल मुश्किल से बिहार विधानसभा में खाता खोल पा रहे हैं. लोकसभा में तो इस पर भी ग्रहण लग गया है.
कभी बिहार में राज करनेवाली कांग्रेस लालू प्रसाद की पिछलग्गू बन गई. कांग्रेस का भी जनाधार बद से बदतर की स्थिति में पहुंच गया. लालू प्रसाद से अलग होकर अब कांग्रेस और वामदल फिर से अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में प्रभुनाथ और लालू की दोस्ती के मायने आसानी से समझे जा सकते हैं।
Saturday, August 7, 2010
'कुछ कर दिखाना है'
अमरेश राय इन दिनों दिल्ली के पॉश इलाके साउथ एक्सटेंशन-2 में रहते हैं. वहीं, एक भाई साहब के साथ मिलकर अपनी कंपनी. जो छात्रों के विदेश में पढ़ने भेजती है. उनके व्यक्तित्व का विकास करती है. उसे सिरे चढ़ाने की कोशिशों में लगे हैं. भाई अमरेश के मन में छटपाहट है. देश और समाज के लिए कुछ कर गुजरने की. जितनी बार बात होती है. ये टीस उनकी बातों में झलकती है. देश और दुनिया में क्या चल रहा है. वो उस पर पैनी नजर रखते हैं और जैसे ही कोई बात को और विस्तार में समझना होता है या फिर किसी चीज पर राय लेनी होती है. तुरंत फोन खटखटा देते हैं. फिर बेबाक राय का सिलसिला शुरू होता है. हालांकि इससे समाज और देश का कोई भला नहीं होता है. लेकिन उसकी भूमिका में एक कदम और जरूर जुड़ता है. ऐसा मेरा मानना है.
अमरेश राय से मुलाकात इलहाबाद में 1992 में हुई. बस्ती के खलीलाबाद से मेडिकल की तैयारी का सपना लेकर इलाहाबाद आए अमरेश एक कोचिंग सेंटर के हॉस्टल में रहते थे. वहीं, पास ही हमारे कुछ अन्य मित्र थे. जिनका राय साहब से आते-जाते परिचय हो गया था. एक दिन हम भी उन्हीं लोगों के साथ राय साहब के कमरे पर पहुंचा और फिर वहीं, से मुलाकात और एक-दूसरे के बारे में जानने का सिलसिला शुरू हुआ. जो अभी तक जारी है. हम एक-दूसरे को अब भी समझ रहे हैं.
मेडिकल की पढ़ाई में मन नहीं लगा. मन से उद्यमी राय साहब ने इलाहाबाद से दिल्ली के लिए उड़ान भर दी. दिल्ली में रहते हुए राय साहब ने कई काम किए. उस समय शायद नियति को मंजूर नहीं था. कि राय साहब दिल्ली में तरक्की करें. सो पेट की गंभीर बीमारी का शिकार हो गए और जो ताना बाना बुना था. वो एक झटके में खत्म हो गया और राय साहब फिर गोरखपुर की पथरीली जमीन पर पहुंच गए. वहीं, से फिर नया दौर शुरू हुआ. शिक्षा के क्षेत्र में कुछ कर गुजरने का. इसमें राय साहब सफल भी हुए और जल्द गोरखपुर में अंग्रेजी भाषा पढ़ानेवाले अच्छे शिक्षकों में से एक बन गए. लेकिन राय साहब की मंजिल गोरखपुर नहीं थी. सो हैदराबाद पहुंच गए. जहां से उन्होंने छात्रों को विदेश में पढ़ाई के लिए भेजने का सिलसिला शुरू किया. जो अभी तक जारी है और दिनों दिन उसका करवां बढ़ता जा रहा है. राय साहब भले ही अभी तक अपनी पहचान उस स्तर पर नहीं बना पाए हैं. जिसके लिए वो प्रयासरत हैं. क्योंकि इसके आड़े में आ रहा है धन. जो अभी उनके पास नहीं है. लेकिन इतना जरूर है कि शाम को भूखे नहीं सोना पड़ता है. अपने साथ परिवार और आसपास के लोगों का खासा ख्याल राय साहब रखते हैं. उनमें से एक मैं भी हूं. जो उनकी कृपा को शायद अपने अंतिम समय तक नहीं भुला सकता. ये तो व्यक्तिगत बात हुई. लेकिन जुड़ी राय साहब के सरोकार से है. इसलिए इसका उल्लेख जरूरी था.
राय साहब के मन में देश के लिए कुछ कर गुजरने का कीड़ा चल रहा है. जिसका जिक्र मैं पहले भी कर चुका हूं. आज सुबह की ही बात है. राय साहब का फोन आया और कहने लगे. कि बॉस मैं शांति से इस दुनिया से नहीं जाना चाहता हैं. ऐसा कुछ करना चाहता हूं. जिसके बारे में लोग सोचें और बोले. ऐसा काम जो अच्छा हो और देश को आगे बढ़ाए. ये सब राय साहब अन्य लोगों की तरह अमर होने के लिए नहीं कह रहे हैं. लेकिन उनकी एक सोच रही है. कि कुछ करना चाहिए. पर अभी तक राय साहब को वो मंच नहीं मिला है. जिसकी तलाश उन्हें है. लेकिन जिस तरह से वो अपने मिशन में जुटे हैं. हमें उम्मीद ही नहीं...विश्वास है कि उन्हें जल्द ही वो मिलेगा.
अमरेश राय से मुलाकात इलहाबाद में 1992 में हुई. बस्ती के खलीलाबाद से मेडिकल की तैयारी का सपना लेकर इलाहाबाद आए अमरेश एक कोचिंग सेंटर के हॉस्टल में रहते थे. वहीं, पास ही हमारे कुछ अन्य मित्र थे. जिनका राय साहब से आते-जाते परिचय हो गया था. एक दिन हम भी उन्हीं लोगों के साथ राय साहब के कमरे पर पहुंचा और फिर वहीं, से मुलाकात और एक-दूसरे के बारे में जानने का सिलसिला शुरू हुआ. जो अभी तक जारी है. हम एक-दूसरे को अब भी समझ रहे हैं.
मेडिकल की पढ़ाई में मन नहीं लगा. मन से उद्यमी राय साहब ने इलाहाबाद से दिल्ली के लिए उड़ान भर दी. दिल्ली में रहते हुए राय साहब ने कई काम किए. उस समय शायद नियति को मंजूर नहीं था. कि राय साहब दिल्ली में तरक्की करें. सो पेट की गंभीर बीमारी का शिकार हो गए और जो ताना बाना बुना था. वो एक झटके में खत्म हो गया और राय साहब फिर गोरखपुर की पथरीली जमीन पर पहुंच गए. वहीं, से फिर नया दौर शुरू हुआ. शिक्षा के क्षेत्र में कुछ कर गुजरने का. इसमें राय साहब सफल भी हुए और जल्द गोरखपुर में अंग्रेजी भाषा पढ़ानेवाले अच्छे शिक्षकों में से एक बन गए. लेकिन राय साहब की मंजिल गोरखपुर नहीं थी. सो हैदराबाद पहुंच गए. जहां से उन्होंने छात्रों को विदेश में पढ़ाई के लिए भेजने का सिलसिला शुरू किया. जो अभी तक जारी है और दिनों दिन उसका करवां बढ़ता जा रहा है. राय साहब भले ही अभी तक अपनी पहचान उस स्तर पर नहीं बना पाए हैं. जिसके लिए वो प्रयासरत हैं. क्योंकि इसके आड़े में आ रहा है धन. जो अभी उनके पास नहीं है. लेकिन इतना जरूर है कि शाम को भूखे नहीं सोना पड़ता है. अपने साथ परिवार और आसपास के लोगों का खासा ख्याल राय साहब रखते हैं. उनमें से एक मैं भी हूं. जो उनकी कृपा को शायद अपने अंतिम समय तक नहीं भुला सकता. ये तो व्यक्तिगत बात हुई. लेकिन जुड़ी राय साहब के सरोकार से है. इसलिए इसका उल्लेख जरूरी था.
राय साहब के मन में देश के लिए कुछ कर गुजरने का कीड़ा चल रहा है. जिसका जिक्र मैं पहले भी कर चुका हूं. आज सुबह की ही बात है. राय साहब का फोन आया और कहने लगे. कि बॉस मैं शांति से इस दुनिया से नहीं जाना चाहता हैं. ऐसा कुछ करना चाहता हूं. जिसके बारे में लोग सोचें और बोले. ऐसा काम जो अच्छा हो और देश को आगे बढ़ाए. ये सब राय साहब अन्य लोगों की तरह अमर होने के लिए नहीं कह रहे हैं. लेकिन उनकी एक सोच रही है. कि कुछ करना चाहिए. पर अभी तक राय साहब को वो मंच नहीं मिला है. जिसकी तलाश उन्हें है. लेकिन जिस तरह से वो अपने मिशन में जुटे हैं. हमें उम्मीद ही नहीं...विश्वास है कि उन्हें जल्द ही वो मिलेगा.
Friday, August 6, 2010
क्या तलाक की तैयारी है !
बिहार में बड़े भाई-छोटे भाई के रूप में चुनाव में उतरने का दावा करनेवाले आरजेडी-एलजेपी में क्या चल रहा है. क्या दोनों में तलाक की तैयारी है. क्या दोनों दलों के बड़े नेता जो साथ मिलकर लड़ने का दावा कर रहे थे. वो अब आगे जारी नहीं रहेगा. आखिर दोनों दलों के बीच पेच क्या फंस रहा है. अभी तक क्यों नहीं हो सका है दोनों दलों के बीच सीटों का बटवारा. लालू-पासवान एक सप्ताह से क्यों नहीं दिख रहे हैं साथ.
14 जुलाई को पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में रामविलास पासवान ने घोषणा की थी. कि अगले सप्ताह भर में सीटों को लेकर आरजेडी से उनका समझौता हो जाएगा और सार्वजनिक रूप से समझौते का ऐलान कर दिया जाएगा. इस बयान को इक्कीस दिन से ज्यादा बीत चुके हैं. लेकिन अभी तक दोनों दलों के बीच सीटों पर सहमति नहीं बन पाई है. सीट बटवारे में हो रही देरी को लेकर एलजेपी नेता अपनी चिंता जाहिर कर चुके हैं. लेकिन आरजेडी के नेता इस मुद्दे पर चुप हैं. दोनों दलों के मुखिया दिल्ली में हैं और संसद की कार्यवाही में भाग ले रहे हैं.
आरजेडी-एलजेपी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष भी दिल्ली में हैं और पिछले कई दिनों से सीटों के बटवारे को लेकर माथापच्ची चल रही है. लेकिन अभी तक सहमति नहीं बनी है. सूत्रों की मानें तो एलजेपी जितनी सीटों की मांग कर रही है वो देने के लिए आरजेडी तैयार नहीं है. एलजेपी का मंसूबा पहले नब्बे से पंचानबे सीटों पर लड़ने का था. लेकिन अब पार्टी अस्सी सीटों की मांग कर रही हैं. लेकिन सूत्रों का कहना है कि आरजेडी केवल चालीस सीटें ही एलजेपी को देना चाहती है. बस इसी बात को लेकर दोनों दलों के बीच किचकिच पैदा हो गई है.
खबर तो यहां तक है कि आरजेडी और एलजेपी के रिश्तों में तलाक हो सकता है. अगर कांग्रेस की ओर से अच्छा ऑफर एलजेपी को मिल गया. तो रामविलास पासवान कांग्रेस के साथ मिलकर बिहार में चुनाव लड़ सकते हैं. कहा तो ये भी जा रहा है कि इस दिशा में बात के लिए पासवान कदम भी बढ़ा चुके हैं. लेकिन सच्चाई क्या है. ये तो पासवान ही जानें. या फिर उस वक्त का इंतजार करना होगा. जब पासवान अपने पत्ते खोलेंगे. लेकिन पिछले कुछ दिनों से जिस तरह से आरजेडी और एलजेपी के नेता चुप्पी साधे हुए हैं. वो अपने आप में चौकानेवाली है और आनेवाले दिनों में इसके राजनीतिक परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
14 जुलाई को पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में रामविलास पासवान ने घोषणा की थी. कि अगले सप्ताह भर में सीटों को लेकर आरजेडी से उनका समझौता हो जाएगा और सार्वजनिक रूप से समझौते का ऐलान कर दिया जाएगा. इस बयान को इक्कीस दिन से ज्यादा बीत चुके हैं. लेकिन अभी तक दोनों दलों के बीच सीटों पर सहमति नहीं बन पाई है. सीट बटवारे में हो रही देरी को लेकर एलजेपी नेता अपनी चिंता जाहिर कर चुके हैं. लेकिन आरजेडी के नेता इस मुद्दे पर चुप हैं. दोनों दलों के मुखिया दिल्ली में हैं और संसद की कार्यवाही में भाग ले रहे हैं.
आरजेडी-एलजेपी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष भी दिल्ली में हैं और पिछले कई दिनों से सीटों के बटवारे को लेकर माथापच्ची चल रही है. लेकिन अभी तक सहमति नहीं बनी है. सूत्रों की मानें तो एलजेपी जितनी सीटों की मांग कर रही है वो देने के लिए आरजेडी तैयार नहीं है. एलजेपी का मंसूबा पहले नब्बे से पंचानबे सीटों पर लड़ने का था. लेकिन अब पार्टी अस्सी सीटों की मांग कर रही हैं. लेकिन सूत्रों का कहना है कि आरजेडी केवल चालीस सीटें ही एलजेपी को देना चाहती है. बस इसी बात को लेकर दोनों दलों के बीच किचकिच पैदा हो गई है.
खबर तो यहां तक है कि आरजेडी और एलजेपी के रिश्तों में तलाक हो सकता है. अगर कांग्रेस की ओर से अच्छा ऑफर एलजेपी को मिल गया. तो रामविलास पासवान कांग्रेस के साथ मिलकर बिहार में चुनाव लड़ सकते हैं. कहा तो ये भी जा रहा है कि इस दिशा में बात के लिए पासवान कदम भी बढ़ा चुके हैं. लेकिन सच्चाई क्या है. ये तो पासवान ही जानें. या फिर उस वक्त का इंतजार करना होगा. जब पासवान अपने पत्ते खोलेंगे. लेकिन पिछले कुछ दिनों से जिस तरह से आरजेडी और एलजेपी के नेता चुप्पी साधे हुए हैं. वो अपने आप में चौकानेवाली है और आनेवाले दिनों में इसके राजनीतिक परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
कलमाड़ी जी कैसे कराएं जांच...?
कलमाड़ी को कॉमनवेल्थ खेल की चिंता है और वो इसे सफलतापूर्वक सम्मन्न कराना चाहते हैं. इसलिए अपनी कुर्सी से चिपके रहना चाहते हैं. साथ ही कलमाड़ी भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की बात भी कर रहे हैं और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की बात कर रहे हैं. लेकिन ये कैसे हो सकता है. कलमाड़ी के पद पर बने रहते जांच कैसे हो सकती है. क्योंकि कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों में जो तीन का तेरह हुआ है. वो क्या कलमाड़ी की नजर में नहीं था. क्या अध्यक्ष होने के नाते उनका ये फर्ज नहीं बनता था कि जो पैसा खर्च हो रहा है. उसका हिसाब क्या है. क्यों बाजार में जो चीज कुछ हजार में रही है. उसके लिए कमेटी लाखों रुपए खर्च करने को तैयार है.
जो ट्रेडमिल बाजार में तीन लाख में मिल रही है. उसके लिए लगभग दस लाख किराया दिए जाने की तैयारी कैसे हो रही है. कोषाध्यक्ष जैसे पद पर बैठे व्यक्ति के बेटे को कैसे कांट्रेक्ट दिया जा रहा है और वो भी उस फर्म को जिस पर पहले से ही दाग है. उस एजेंसी को मोटा कमीशन देने की तैयारी क्यों की गई. जो पिछले दो साल में एक भी प्रायोजक नहीं जुटा पाई है. भला हो कांग्रेस के सांसद मणिशंकर अय्यर का और उस मीडिया को जिसने पूरा मामला उजागर किया.
कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले उजागर हुए इन मामलों से आम आमदी जिसके खून पसीने का पैसा है. कुछ तो लुटने से बच रहा है. अभी कहां-कहां और कितना बड़ा धांधली का मामला है इसकी तो अभी परत दर परत खुलने लगी है. अभी तो और भी कई बड़े खुलासे लगता है कि आनेवाले दिनों में होते रहेंगे. नौ की जगह नब्बे खर्च करके क्या देश की साख बढ़ाई जा सकती है. घटिया सुविधाएं देकर क्या देश का नाम रोशन किया जा सकता है.
वर्ल्ड क्लास सुविधा देने की बात हो रही है. लेकिन जिस तहह की तैयारियां हो रही है. जिस तरह से छत से पानी टकप रहा है. काम आधे-अधूरे पड़े हैं. वैसे में देश का सम्मान कैसे बच सकता है. कैसे कलमाड़ी साहब कह रहे हैं कि उनकी पहली प्राथमिकता कॉमनवेल्थ गेम्स है. और उन्हें वो सफलता पूर्वक सम्पन्न कराएंगे.
ये वही कलमाड़ी साहब है जो पंद्रह दिन पहले तक कह रहे थे. कि कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं है. लेकिन जब परतें खुलने लगी. तो कार्रवाई भी शुरू हो गई. हालांकि कार्रवाई केवल साख बचाने जैसी लगती है. लेकिन क्या इससे इससे कॉमनवेल्थ गेम के आयोजन समिति की साख बचेगी...?
जो ट्रेडमिल बाजार में तीन लाख में मिल रही है. उसके लिए लगभग दस लाख किराया दिए जाने की तैयारी कैसे हो रही है. कोषाध्यक्ष जैसे पद पर बैठे व्यक्ति के बेटे को कैसे कांट्रेक्ट दिया जा रहा है और वो भी उस फर्म को जिस पर पहले से ही दाग है. उस एजेंसी को मोटा कमीशन देने की तैयारी क्यों की गई. जो पिछले दो साल में एक भी प्रायोजक नहीं जुटा पाई है. भला हो कांग्रेस के सांसद मणिशंकर अय्यर का और उस मीडिया को जिसने पूरा मामला उजागर किया.
कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले उजागर हुए इन मामलों से आम आमदी जिसके खून पसीने का पैसा है. कुछ तो लुटने से बच रहा है. अभी कहां-कहां और कितना बड़ा धांधली का मामला है इसकी तो अभी परत दर परत खुलने लगी है. अभी तो और भी कई बड़े खुलासे लगता है कि आनेवाले दिनों में होते रहेंगे. नौ की जगह नब्बे खर्च करके क्या देश की साख बढ़ाई जा सकती है. घटिया सुविधाएं देकर क्या देश का नाम रोशन किया जा सकता है.
वर्ल्ड क्लास सुविधा देने की बात हो रही है. लेकिन जिस तहह की तैयारियां हो रही है. जिस तरह से छत से पानी टकप रहा है. काम आधे-अधूरे पड़े हैं. वैसे में देश का सम्मान कैसे बच सकता है. कैसे कलमाड़ी साहब कह रहे हैं कि उनकी पहली प्राथमिकता कॉमनवेल्थ गेम्स है. और उन्हें वो सफलता पूर्वक सम्पन्न कराएंगे.
ये वही कलमाड़ी साहब है जो पंद्रह दिन पहले तक कह रहे थे. कि कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं है. लेकिन जब परतें खुलने लगी. तो कार्रवाई भी शुरू हो गई. हालांकि कार्रवाई केवल साख बचाने जैसी लगती है. लेकिन क्या इससे इससे कॉमनवेल्थ गेम के आयोजन समिति की साख बचेगी...?
Thursday, August 5, 2010
मोदी जी कहां है राजेश गुप्ता ?
लखीसराय के बीजेपी कार्यकर्ता राजेश गुप्ता का पता नहीं है. दो अगस्त से राजेश घर नहीं लौटा है. वही दो अगस्त जब राजेश पार्टी के विकास शिविर में भाग लेने के लिए गया था. जहां सूबे के डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी आए थे. विकास शिविर के दौरान राजेश ने ट्रेजरी निकासी से संबंधित सवाल मोदी से किया था. जिस पर मोदी ने आपा खो दिया और पुलिसवालों को राजेश को वहां से ले जाने को कह दिया. पुलिसवाले राजेश को अपने साथ लेकर गए. जिसके बाद अभी तक राजेश का पता नहीं है.
सरकार और उसके हाकिम से जुड़ा मामला है. सो लखीसराय के प्रशासन के जुबान पर ताला लगा है. डीएम से लेकर कोई भी आला अधिकारी कुछ बोलने को तैयार नहीं है. दबी जुबान से कुछ अधिकारी कह रहे हैं कि राजेश का दिमागी संतुलन ठीक नहीं है. और उसे छोड़ दिया गया था. जिसके बाद उसका पता नहीं है. लेकिन जिस जगह पर राजेश रहता है. वहां के वार्ड पार्षद कुछ और ही कह रहे हैं. वो बताते है कि राजेश बहुत ही होनहार था. पढ़ने में भी अपने कॉलेज में टॉप था. पिछले कुछ सालों से बीजेपी का समर्पित कार्यकर्ता था. उसके साथ जो हुआ. वो ठीक नहीं है.
वहीं, राजेश के परिजन परेशान हैं. उनके घर में खाना नहीं बन रहा है. चूल्हा चौकी सब बंद है. राजेश कहां है उन्हें इस बात का पता नहीं है. राजेश के परिजन भी उसके मानसिक रूप से ठीक होने के बात कह रहे हैं. इस बीच खबर ये भी है कि लखीसराय बीजेपी का ही एक नेता राजेश को लेकर पटना गया था. लेकिन पटना में भी राजेश किसी को नहीं दिखा. अब सवाल ये है कि अगर राजेश बीजेपी नेताओं के साथ है. तो उन्हें इसका खुलासा करना चाहिए. क्योंकि ये केवल बीजेपी पार्टी का मामला नहीं है. ये एक परिवार से जुड़ा मामला है. जिसके यहां पिछले तीन दिनों से खाना बनना बंद है और राजेश के परिजन किसी अनहोनी की आशंका से डरे हैं।
सरकार और उसके हाकिम से जुड़ा मामला है. सो लखीसराय के प्रशासन के जुबान पर ताला लगा है. डीएम से लेकर कोई भी आला अधिकारी कुछ बोलने को तैयार नहीं है. दबी जुबान से कुछ अधिकारी कह रहे हैं कि राजेश का दिमागी संतुलन ठीक नहीं है. और उसे छोड़ दिया गया था. जिसके बाद उसका पता नहीं है. लेकिन जिस जगह पर राजेश रहता है. वहां के वार्ड पार्षद कुछ और ही कह रहे हैं. वो बताते है कि राजेश बहुत ही होनहार था. पढ़ने में भी अपने कॉलेज में टॉप था. पिछले कुछ सालों से बीजेपी का समर्पित कार्यकर्ता था. उसके साथ जो हुआ. वो ठीक नहीं है.
वहीं, राजेश के परिजन परेशान हैं. उनके घर में खाना नहीं बन रहा है. चूल्हा चौकी सब बंद है. राजेश कहां है उन्हें इस बात का पता नहीं है. राजेश के परिजन भी उसके मानसिक रूप से ठीक होने के बात कह रहे हैं. इस बीच खबर ये भी है कि लखीसराय बीजेपी का ही एक नेता राजेश को लेकर पटना गया था. लेकिन पटना में भी राजेश किसी को नहीं दिखा. अब सवाल ये है कि अगर राजेश बीजेपी नेताओं के साथ है. तो उन्हें इसका खुलासा करना चाहिए. क्योंकि ये केवल बीजेपी पार्टी का मामला नहीं है. ये एक परिवार से जुड़ा मामला है. जिसके यहां पिछले तीन दिनों से खाना बनना बंद है और राजेश के परिजन किसी अनहोनी की आशंका से डरे हैं।
Wednesday, August 4, 2010
सूखे पर चुनावी तड़का
बिहार सरकार ने 38 में से 28 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है. इसे सरकार का सराहनीय कदम कहें. इससे पहले उन आकड़ों पर नजर डालना जरूरी है. जो मौसम विभाग की ओर से जारी किए गए हैं. अभी तक बिहार में औसत से केवल 24 फीसदी कम बारिश हुई है. जो अगस्त और सितंबर में होनेवाली बारिश से कवर हो सकती है. ये हम नहीं विशेषज्ञ कहते हैं.
अब सवाल उठता है कि आखिर बिहार सरकार को क्या हड़बड़ी थी. जो उसने 28 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया. इसके पीछे वजह. बिहार विधानसभा चुनाव हैं. जो अगले दो महीने में होनेवाले हैं. जिसके लिए जल्दी ही अधिसूचना जारी होनेवाली है. तब सरकार के हाथ बंध जाएंगे. इसीलिए 28 जिलों को सूखाग्रस्त ही घोषित नहीं किया गया है. बल्कि कैबिनेट ने मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली कमेटी को ये भी अधिकार दिए हैं. कि बाकी बचे दस जिलों के बारे में वो फैसला ले सकती है. यानि आनेवाले दिनों में प्रशासनिक स्तर पर कोई घोषणा हो. तो चौकिएगा नहीं.
पिछले साल औसत से लगभग पचहत्तर फीसदी कम बारिश हुई थी और बारिश नहीं होने को लेकर चारों ओर हाहाकार मचा था. काफी माथापच्ची के बाद सरकार ने दस अगस्त को 26 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया था. जबकि इस बार एक सप्ताह पहले यानि तीन अगस्त को भी 28 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित करने का फैसला ले लिया गया.
विपक्ष सरकार की चाल समझता है. लेकिन उसे भी वोट चाहिए. इसलिए वार तो कर रहा है. लेकिन संभलकर. आरजेडी-एलजेपी ने तो अभी इस पर मुंह नहीं खोला है. लेकिन कांग्रेस ने गम खाते हुए टिप्पणी कर ही दी. आखिर इतनी क्या जल्दी थी.
अब सवाल उठता है कि आखिर बिहार सरकार को क्या हड़बड़ी थी. जो उसने 28 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया. इसके पीछे वजह. बिहार विधानसभा चुनाव हैं. जो अगले दो महीने में होनेवाले हैं. जिसके लिए जल्दी ही अधिसूचना जारी होनेवाली है. तब सरकार के हाथ बंध जाएंगे. इसीलिए 28 जिलों को सूखाग्रस्त ही घोषित नहीं किया गया है. बल्कि कैबिनेट ने मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली कमेटी को ये भी अधिकार दिए हैं. कि बाकी बचे दस जिलों के बारे में वो फैसला ले सकती है. यानि आनेवाले दिनों में प्रशासनिक स्तर पर कोई घोषणा हो. तो चौकिएगा नहीं.
पिछले साल औसत से लगभग पचहत्तर फीसदी कम बारिश हुई थी और बारिश नहीं होने को लेकर चारों ओर हाहाकार मचा था. काफी माथापच्ची के बाद सरकार ने दस अगस्त को 26 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया था. जबकि इस बार एक सप्ताह पहले यानि तीन अगस्त को भी 28 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित करने का फैसला ले लिया गया.
विपक्ष सरकार की चाल समझता है. लेकिन उसे भी वोट चाहिए. इसलिए वार तो कर रहा है. लेकिन संभलकर. आरजेडी-एलजेपी ने तो अभी इस पर मुंह नहीं खोला है. लेकिन कांग्रेस ने गम खाते हुए टिप्पणी कर ही दी. आखिर इतनी क्या जल्दी थी.
Tuesday, August 3, 2010
सुशील मोदी के तेवर देखो...
सुशील मोदी. यानि बिहार में नीतीश के डिप्टी. पार्टी में विरोध के बाद भी डिप्टी सीएम की कुर्सी हथियाने में कामयाब रहे. वित्त मंत्रालय भी सुशील मोदी के पास है. हाल में जो कैग रिपोर्ट में ट्रेजरी से निकासी का मामला आया है. वो भी वित्त मंत्रालय से ही जुड़ा हुआ है. क्योंकि सूबे में जिनता पैसा आता-जाता है. उसका लेखा वित्त मंत्रालय को ही रखना होता है.
मोदी जी गए थे लखीसराय में अपनी पार्टी बीजेपी के कार्यालय का उद्घाटन करने के लिए. वहीं पर कार्यक्रम के दौरान पार्टी के ही एक कार्यकर्ता ने उनसे कैग रिपोर्ट पर सवाल करने की जुर्रत कर दी. फिर क्या था. मोदी जी की त्योरी चढ़ गई और उन्होंने उस कार्यकर्ता को गिरफ्तार करने का निर्देश जारी कर दिया. मौके पर मौजूद पुलिसवालों ने क्या बिसात कि वो हुक्म की नाफरमानी करते. कार्यकर्ता को पुलिसवालों ने हिरासत में ले लिया और बैठा लिया जीप में. ले गए पुलिस थाने. पुलिस थाने में क्या होता है. आप सब लोग जानते हैं. उस पर ज्यादा प्रकाश डालने की जरूरत नही हैं.
जैसे ही युवक को पकड़ कर कार्यक्रम स्थल से बाहर ले गए पुलिसवाले. सुशील मोदी को एनडीए की याद आई और उन्होंने एनडीए के पक्ष में नारेबाजी शुरू कर दी. एनडीए एकता. बाकी काम पार्टी कार्यकर्ताओं ने जिंदाबाद करके कर दी.
मोदी ने जो किया या करवाया. वो ट्रेजरी से अरबों रुपए की निकासी को लेकर सरकार की हो रही किरकिरी की खीझ कही जा सकती है. विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेर रहा है. राज्यसभा तक का कामकाज स्थगित हो रहा है. लेकिन क्या मजाल है कि राज्यसभा में सवाल उठानेवालों पर मोदी जी ऐसा कर सकते हैं. आखिर ये कैसा मानदंड है. क्यों खुलकर मोदी जी और उनकी पार्टी इस मुद्दे पर साफ-साफ नहीं कह रहे हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी बच रहे हैं.
आखिर इसके पीछे बात क्या है. ये जनता को बताना चाहिए. क्योंकि आम लोग ये जानना चाहते हैं. जिस तरह से लखीसराय में सच जानने की कोशिश करनेवाले व्यक्ति की जुबान बंद की गई. अगर ऐसा होता रहा. तो इसका संदेश लोगों के बीच में क्या जाएगा. ये सभी जानते हैं. और ऐसे में चुनावी साल में मोदी जैसे लोगों की क्या गति होगी. ये भी शादय किसी के छुपा नहीं है. क्योंकि जनता जिसे सिरे चढ़ाती है. अगर उसको सही जबाव नहीं मिले. तो उतार भी देती है. केवल ये कहने से काम नहीं चलेगा. कि पिछले पांच साल में बहुत काम हुआ है.
अगर हम कहें कि पिछले पांच साल में बहुत पाप हुआ है. तो क्या ये सही हो जाएगा. जब तक की हम अपने तर्क के पक्ष में कुछ ऐसे सबूत नहीं पेश करें. जिन पर लोग विश्वास करें. देश और दुनिया भले ही दूर से मान ले. लेकिन जो लोग रह रहे हैं और स्थितियों का सामना कर रहे हैं. उनसे तो कुछ छुपा नहीं है.
मोदी जी गए थे लखीसराय में अपनी पार्टी बीजेपी के कार्यालय का उद्घाटन करने के लिए. वहीं पर कार्यक्रम के दौरान पार्टी के ही एक कार्यकर्ता ने उनसे कैग रिपोर्ट पर सवाल करने की जुर्रत कर दी. फिर क्या था. मोदी जी की त्योरी चढ़ गई और उन्होंने उस कार्यकर्ता को गिरफ्तार करने का निर्देश जारी कर दिया. मौके पर मौजूद पुलिसवालों ने क्या बिसात कि वो हुक्म की नाफरमानी करते. कार्यकर्ता को पुलिसवालों ने हिरासत में ले लिया और बैठा लिया जीप में. ले गए पुलिस थाने. पुलिस थाने में क्या होता है. आप सब लोग जानते हैं. उस पर ज्यादा प्रकाश डालने की जरूरत नही हैं.
जैसे ही युवक को पकड़ कर कार्यक्रम स्थल से बाहर ले गए पुलिसवाले. सुशील मोदी को एनडीए की याद आई और उन्होंने एनडीए के पक्ष में नारेबाजी शुरू कर दी. एनडीए एकता. बाकी काम पार्टी कार्यकर्ताओं ने जिंदाबाद करके कर दी.
मोदी ने जो किया या करवाया. वो ट्रेजरी से अरबों रुपए की निकासी को लेकर सरकार की हो रही किरकिरी की खीझ कही जा सकती है. विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेर रहा है. राज्यसभा तक का कामकाज स्थगित हो रहा है. लेकिन क्या मजाल है कि राज्यसभा में सवाल उठानेवालों पर मोदी जी ऐसा कर सकते हैं. आखिर ये कैसा मानदंड है. क्यों खुलकर मोदी जी और उनकी पार्टी इस मुद्दे पर साफ-साफ नहीं कह रहे हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी बच रहे हैं.
आखिर इसके पीछे बात क्या है. ये जनता को बताना चाहिए. क्योंकि आम लोग ये जानना चाहते हैं. जिस तरह से लखीसराय में सच जानने की कोशिश करनेवाले व्यक्ति की जुबान बंद की गई. अगर ऐसा होता रहा. तो इसका संदेश लोगों के बीच में क्या जाएगा. ये सभी जानते हैं. और ऐसे में चुनावी साल में मोदी जैसे लोगों की क्या गति होगी. ये भी शादय किसी के छुपा नहीं है. क्योंकि जनता जिसे सिरे चढ़ाती है. अगर उसको सही जबाव नहीं मिले. तो उतार भी देती है. केवल ये कहने से काम नहीं चलेगा. कि पिछले पांच साल में बहुत काम हुआ है.
अगर हम कहें कि पिछले पांच साल में बहुत पाप हुआ है. तो क्या ये सही हो जाएगा. जब तक की हम अपने तर्क के पक्ष में कुछ ऐसे सबूत नहीं पेश करें. जिन पर लोग विश्वास करें. देश और दुनिया भले ही दूर से मान ले. लेकिन जो लोग रह रहे हैं और स्थितियों का सामना कर रहे हैं. उनसे तो कुछ छुपा नहीं है.
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