बिहार चुनाव की सरगर्मी चरम पर है. चुनावी सरगर्मी के बीच निष्ठाएं बदलने का दौर भी जारी है. सालों की दोस्ती ताश के पत्तों की तरह ढह रही है. दुहाई और कसमें चरमरा और भहरा रही हैं. नेता कपड़ों की तरह पार्टी बदल रहे हैं. पार्टी बदलने के बाद सुर भी बदल रहे हैं. कल तक जो फूटी आंख नहीं सुहाता था. चुनावी नफा-नुकसान में वहीं सबसे बड़ा हितैषी और विकास करनेवाला बन रहा है. कोई कह रहा है कि लालू केवल सत्ता के लिए राजनीति कर रहे हैं. तो कोई उन्हें गरीबों और मजलूमों का मसीहा बताने में जुटा है. यही बात नीतीश और रामविलास के लिए भी कही जा रही है.
आज ही आरजेडी से बीस सालों का वास्ता तोड़कर पूर्व केंद्रीय मंत्री अखिलेश सिंह अलग हो गए. अखिलेश ने कांग्रेस में जाने की स्क्रिप्ट तैयार कर ली है. अब उस पर केवल अमली जामा पहनाया जाना बाकी है. पार्टी छोड़ने के साथ लालू प्रसाद में उन्हें खामियां ही खामियां नजर आने लगीं. लालू को सवर्णों का विरोधी करार दिया. जिस एमवाई यानि मुस्लिम-यादव समीकरण के सहारे लालू ने पंद्रह सालों तक बिहार पर राज किया. उसी एमवाई समीकरण को अखिलेश ने नया नाम दे दिया है. अखिलेश अब इसे पाई समीकरण बताने में जुटे हैं. पाई यानि पासवान-यादव. चूंकि लालू प्रसाद यादव हैं और उनका चुनावी समझौता रामविलास पासवान के साथ है. सो समीकरण को पाई कह दिया गया. अखिलेश के साथ आरजेडी के एक और नेता नाराज हैं. इनका नाम उमाशंकर सिंह हैं. जनाब महराजगंज से सांसद हैं और प्रभुनाथ सिंह जैसे कद्दावर नेता को हराकर जीते हैं. अब प्रभुनाथ आरजेडी में आ गए हैं. सो सबसे ज्यादा परेशानी उमाशंकर सिंह को है. वो अपना विरोध तो जता रहे हैं. लेकिन कुर्सी का मोह ही ऐसा है कि छोड़ा नहीं जा रहा है. सो पार्टी के अंदर रहकर ही विरोध कर रहे हैं. क्योंकि अगर पार्टी से बाहर चले जाएंगे. तो सांसद की कुर्सी चली जाएगी और सांसद महोदय को ये डर तो सता ही रहा है कि अगली बार जनता साथ दे या नहीं. ऐसा ही हाल जेडीयू सांसद ललन सिंह का है. जो खुलकर कांग्रेस के पक्ष में हैं. लेकिन पार्टी छोड़ने के नाम पर चुप्पी साध लेते हैं.
हाल में आरजेडी से पूर्व केंद्रीय मंत्री नागमणि ने भी नाता तोड़ लिया था और धूम धड़ाके के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए थे. कांग्रेस में शामिल होने से पहले ही नागमणि ने जमकर ढोल बजाया और अपने कांग्रेस में जाने की मुनादी की. साथ ही ये तुर्रा भी गांठा कि वो जिस दल में जाते हैं. उसकी सरकार बन जाती है. इसके लिए वो पिछले कई सालों का हवाला देते हैं. लेकिन साहब नागमणि का क्या होता है. ये तो उनके पार्टी बदलने से ही पता चल जाता है. पिछला चुनाव हुआ था. तो नागमणि जेडीयू में थे. लेकिन चुनाव के कुछ दिन बाद ही उनका मोहभंग हो गया और वो आरजेडी के हो गए. लेकिन साहब का मन आरजेडी में भी नहीं लगा. अब कांग्रेस में आए हैं. लेकिन देखना है कि कांग्रेस कितने दिनों तक उनका सहारा बनती है.
आरजेडी के साथ मिलकर सरकार बनाने का दावा करनेवाली एलजेपी में तो जैसे हलचल मची है. पार्टी का पूरा अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ की खिसक कर जेडीयू के पाले में जा गिरा है. साथ ही पार्टी के महासचिव मोहन सिंह ने भी अपना इस्तीफा पार्टी को पकड़ा दिया है. मोहन ने इस्तीफे के साथ गंभीर आरोप भी एलजेपी पर मढ़ा है. उनका कहना है कि पार्टी ने उनसे टिकट के नाम पर दस लाख लिए थे. लेकिन पैसे लेने के बाद भी उनका टिकट काट दिया गया. अब टिकट कट गया है. तो फिर पार्टी में क्या काम. सो मोहन सिंह अब बे-दल हो गए हैं.
ऐसे ही दर्जनों मामले बिहार चुनाव के दौरान देखने को मिल रहे हैं. आनेवाले दिनों में ये सिलसिला बंद होगा. ऐसा नहीं लग रहा है. माना जा रहा है कि प्रत्याशियों की घोषणा के साथ इसमें और तेजी आएगी. जिसका शिकार केवल कोई एक दल ही नहीं होगा. बल्कि दल बदल की मार हर दल पर पड़ेगी. क्योंकि ऐसे ही हम इसे दल-बदल का दलदल नहीं कह रहे हैं.
Saturday, September 18, 2010
Tuesday, August 17, 2010
सहवाग...बडप्पन दिखाओ बड़प्पन...
कथित साजिश का शिकार हुए वीरेंद्र सहवाग. रनदीव ने जान बूझकर बड़ी सी नो बॉल डाली. जिस पर वीरेंद्र सहवाग ने सिक्सर तो लगाया. लेकिन नो बॉल होने के कारण सहवाग के खाते में रन नहीं जुड़ा और सहवाग 99 पर ही नाबाद रह गए. बात निकली. तो साफ-सफाई का सिलसिला शुरू हुआ. श्रीलंका के कप्तान कुमार संगकारा ने झट से कह दिया कि सहवाग शतक के हकदार थे. लेकिन इसके कुछ देर बाद ही सहवाग ने पूरे राज का पर्दाफाश कर दिया और कहा कि उन्हें शतक नहीं बनाने दिया गया. सहवाग ने इस बात का भी खुलासा किया कि इसका शिकार वही नहीं हुए हैं. इससे पहले मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर भी शिकार हो चुके हैं. तब भी सामनेवाली टीम श्रीलंका ही थी.
देखते ही देखते सहवाग का शतक भारत की बोनस अंको से हुई जीत पर भारी पड़ता दिखने लगा. क्रिकेट के पंडित स्टोपर्टस मैन स्पिरिट का बात उठाने लगे. इसी बीच नो बॉल फेकनेवाले रनदीव ने सहवाग से माफी मांग ली. लेकिन सहवाग ने रनदीव को माफ करने से इनकार कर दिया. आखिर सहवाग का ये कौन सा व्यवहार है. रनदीप अभी नए-नए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में आए हैं. जबकि सहवाग के पास सालों का अनुभव है और वो टीम इंडिया के उपकप्तान जैसे जिम्मेदार पद पर भी हैं. ऐसे में सहवाग का रनदीव को नहीं माफ करना. हम तो उनकी जिद ही कहेंगे. क्या सहवाग को बड़प्पन नहीं दिखाना चाहिए. निश्चय ही सहवाग को बडप्पन दिखाते हुए रनदीव को माफ कर देना चाहिए. क्योंकि ये कहा जाता है कि अगर गलती हुई है और उसे मान लिया जाए. तो इससे बड़ी कोई भी चीज नहीं है.
ऐसे में सहवाग को गुस्सा भुलाकर रनदीव को माफ कर देना चाहिए. क्योंकि पूरे प्रकरण से रनदीव को एक सबक तो मिल ही गया है कि खेल अगर खेल भावना से नहीं खेला जाएगा. तो उसका क्या असर हो सकता है. फिर सहवाग कोई रिटायर तो होने नहीं जा रहे हैं. अभी उन्हें ऐसे जाने कितने मैच खेलने हैं और वो जिस शैली में बल्लेबाजी करते हैं. ऐसे कितने ही शतक उनके बल्ले से निकल सकते हैं. हो सकता है कि पाकिस्तान जैसी कोई बड़ी पारी सहवाग को इंतजार कर रही हो. जो उनके सारे गम को भुला दे. फिर मन में गुस्से का भाव लेकर खेल भी अच्छा नहीं खेला जा सकता है. इसलिए सहवाग गुस्सा थूकों और माफ कर दो रनदीव को. आखिर अभी वो नया-नया जो है. इससे तुम्हारा मान ही बढ़ेगा सहवाग.
देखते ही देखते सहवाग का शतक भारत की बोनस अंको से हुई जीत पर भारी पड़ता दिखने लगा. क्रिकेट के पंडित स्टोपर्टस मैन स्पिरिट का बात उठाने लगे. इसी बीच नो बॉल फेकनेवाले रनदीव ने सहवाग से माफी मांग ली. लेकिन सहवाग ने रनदीव को माफ करने से इनकार कर दिया. आखिर सहवाग का ये कौन सा व्यवहार है. रनदीप अभी नए-नए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में आए हैं. जबकि सहवाग के पास सालों का अनुभव है और वो टीम इंडिया के उपकप्तान जैसे जिम्मेदार पद पर भी हैं. ऐसे में सहवाग का रनदीव को नहीं माफ करना. हम तो उनकी जिद ही कहेंगे. क्या सहवाग को बड़प्पन नहीं दिखाना चाहिए. निश्चय ही सहवाग को बडप्पन दिखाते हुए रनदीव को माफ कर देना चाहिए. क्योंकि ये कहा जाता है कि अगर गलती हुई है और उसे मान लिया जाए. तो इससे बड़ी कोई भी चीज नहीं है.
ऐसे में सहवाग को गुस्सा भुलाकर रनदीव को माफ कर देना चाहिए. क्योंकि पूरे प्रकरण से रनदीव को एक सबक तो मिल ही गया है कि खेल अगर खेल भावना से नहीं खेला जाएगा. तो उसका क्या असर हो सकता है. फिर सहवाग कोई रिटायर तो होने नहीं जा रहे हैं. अभी उन्हें ऐसे जाने कितने मैच खेलने हैं और वो जिस शैली में बल्लेबाजी करते हैं. ऐसे कितने ही शतक उनके बल्ले से निकल सकते हैं. हो सकता है कि पाकिस्तान जैसी कोई बड़ी पारी सहवाग को इंतजार कर रही हो. जो उनके सारे गम को भुला दे. फिर मन में गुस्से का भाव लेकर खेल भी अच्छा नहीं खेला जा सकता है. इसलिए सहवाग गुस्सा थूकों और माफ कर दो रनदीव को. आखिर अभी वो नया-नया जो है. इससे तुम्हारा मान ही बढ़ेगा सहवाग.
Friday, August 13, 2010
शरद की 'गरम' जुबान
शरद यादव जतना दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए जाने जाते हैं. लेकिन इस बेबाकी में शरद की जुबान कई बार ऐसा सच बोल जाती है. जो वक्त की नज़ाकत के हिसाब से ठीक नहीं होती है. दिल्ली में शरद यादव कुछ ऐसा ही कह गए. एक किताब के विमोचन समारोह में शरद पहुंचे थे. भाषण के दौरान शरद कॉमनवेल्थ गेम्स का जिक्र कर बैठे और लगे हाथ उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार पर भी शरद बोले. शरद गेम्स के पक्ष में नहीं है. ये बात वो सालों से करते आ रहे हैं.
शरद ने बोलना शुरू किया. तो एसियाड को भी नहीं छोड़ा और कह बैठे की वो भी खेल बहुत अच्छे नहीं थे. घोटाले के दौरान शरद दिल्ली की बात करने लगे और कहने लगे कि यहां मैं छत्तीस साल से हूं. जो भी घोटाला करता है. वो पचा जाता है. कभी पकड़ा नहीं जाता है. शरद से विमोचन समारोह में आए लोगों ने इस संबंध में हामी भरवाई. क्या शरद यादव सही कह रहे हैं या फिर दिल्ली की खिल्ली उड़ा रहे हैं. अगर गौर करें. तो पिछले सालों में कोई ऐसे बड़े आदमी का उदाहरण नहीं है. जो दिल्ली का हो और धांधली करने के बाद पकड़ा गया हो. लेकिन शरद सच है तो क्या सही है. क्या उन्हें सभी दिल्लीवालों पर ऐसे उंगली उठानी चाहिए.
दिल्ली में रहनेवाले सभी लोग तो ऐसा नहीं कर सके. आखिर धांधली करने के लिए भी हैसियत चाहिए. कोई सड़क पर भीख मांगनेवाला और झुग्गी झोपड़ी या दिनभर मजदूरी में हाड़तोड़ मेहनत करनेवाला तो धांधली कर नहीं सकता. फिर एक कहावत है. मूस कितना भी मोटा होगा लोढ़ा से ज्यादा नहीं हो. अगर एक बार को मान भी लिया जाए कि गरीब आदमी धांधली करेगा. तो कितने की. हजार-दो हजार चार हजार की. करोड़ो और अरबों तक तो नहीं पहुंचेगा. दस रुपए की चीज दो सौ में तो नहीं खरीदेगा. ये काम तो कुछ ज्यादा ही गुड़ी लोग कर सकते हैं और ये उनके ही बूते की बात भी है.
शरद ने बोलना शुरू किया. तो एसियाड को भी नहीं छोड़ा और कह बैठे की वो भी खेल बहुत अच्छे नहीं थे. घोटाले के दौरान शरद दिल्ली की बात करने लगे और कहने लगे कि यहां मैं छत्तीस साल से हूं. जो भी घोटाला करता है. वो पचा जाता है. कभी पकड़ा नहीं जाता है. शरद से विमोचन समारोह में आए लोगों ने इस संबंध में हामी भरवाई. क्या शरद यादव सही कह रहे हैं या फिर दिल्ली की खिल्ली उड़ा रहे हैं. अगर गौर करें. तो पिछले सालों में कोई ऐसे बड़े आदमी का उदाहरण नहीं है. जो दिल्ली का हो और धांधली करने के बाद पकड़ा गया हो. लेकिन शरद सच है तो क्या सही है. क्या उन्हें सभी दिल्लीवालों पर ऐसे उंगली उठानी चाहिए.
दिल्ली में रहनेवाले सभी लोग तो ऐसा नहीं कर सके. आखिर धांधली करने के लिए भी हैसियत चाहिए. कोई सड़क पर भीख मांगनेवाला और झुग्गी झोपड़ी या दिनभर मजदूरी में हाड़तोड़ मेहनत करनेवाला तो धांधली कर नहीं सकता. फिर एक कहावत है. मूस कितना भी मोटा होगा लोढ़ा से ज्यादा नहीं हो. अगर एक बार को मान भी लिया जाए कि गरीब आदमी धांधली करेगा. तो कितने की. हजार-दो हजार चार हजार की. करोड़ो और अरबों तक तो नहीं पहुंचेगा. दस रुपए की चीज दो सौ में तो नहीं खरीदेगा. ये काम तो कुछ ज्यादा ही गुड़ी लोग कर सकते हैं और ये उनके ही बूते की बात भी है.
Tuesday, August 10, 2010
किस राह पर बिहार की राजनीति
कोशी प्रमंडल में बिहार विधानसभा की सबसे ज्यादा सीटें हैं. इसी वजह से इस क्षेत्र पर सभी राजनीतिक दलों की नजर है. आनंद मोहन इस क्षेत्र के बड़े नेताओं में शुमार हैं और इस समय गोपालगंज के डीएम जी कृष्णैय्या हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं. सहरसा जेल में बंद बाहुबली आनंद मोहन इन दिनों कोशी की राजनीति की धुरी बने हुए हैं. सभी राजनीतिक दल उन्हें अपने साथ लाने की कोशिश कर रहे हैं.
ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या बिहार के नेताओं ने पिछले साल के लोकसभा चुनाव से कोई सबक नहीं लिया है. जब वोटरों ने सिरे से बाहुबलियों को नकार दिया था. लेकिन अभी तक बाहबुलियों की पूछ अभी तक कम नहीं हुई है. जब से विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट तेज हुई है. राजनीतिक दल बाहुबलियों के सामने नतमस्तक नजर आ रहे हैं और उनके नेता लगातार बाहुबलियों को अपनी ओर मिलाने में लगे हैं. इसे राजनीति का कौन का चेहरा कहा जाए. वो भी तब जब वोटर बाहुबलियों को नकारने में लगे हैं. आखिर इसकी जमीनी सच्चाई क्या है. क्या राजनीतिक दल वोटरों की धारा से उलट बहना चाह रहे हैं. क्या उन्हें लग रहा है कि बाहुबलियों से ही बात बनेगी. अगर ऐसा होता है. तो बिहार जिस ढर्रे पर आगे बढ़ा था. वहीं, पर फिर से पीछे चला जाएगा. यानि कुछ सालों पहले जैसी ही स्थिति हो जाएगी. क्या इसे स्वीकार करने के लिए लोग तैयार हैं.
इस मुहिम में बिहार का कोई एक दल शामिल नहीं है. आरजेडी और जेडीयू प्रमुख दल हैं. इसलिए इन्हीं की चर्चा ज्यादा हो रही है. शुरुआत जेडीयू से हुई थी. जिसने सीमांचल के दबंग नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री तस्लीमुद्दीन को अपने साथ किया. इसके बाद आरजेडी ने प्रभुनाथ को अपने साथ जोड़कर जेडीयू को जवाब दिया. जेडीयू ने आनंद मोहन की ओर भी तुरप का पत्ता फेंका था. खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आनंद मोहन के गांव गए थे और उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए ये भी कहा था कि अगर आनंद मोहन जेडीयू में आते हैं. तो किसी को क्या परेशानी है. इसी के बाद लालू प्रसाद के दूत बनकर रामकृपाल आनंद मोहन से मुलाकात करने के लिए जेल पहुंचे थे. इसके बाद ददन पहलवान ने आनंद मोहन को साथ लाने की कोशिश की. अब फिर रामकृपाल ने आनंद मोहन से मुलाकात की है. इस बार की मुलाकात साढ़े तीन घंटे की थी. माना जा रहा है कि आनंद मोहन आरजेडी के साथ जा सकते हैं. अगर ऐसा होता है. तो सवाल वही हैं कि आखिर बिहार की राजनीति किस राह पर जा रही है.
ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या बिहार के नेताओं ने पिछले साल के लोकसभा चुनाव से कोई सबक नहीं लिया है. जब वोटरों ने सिरे से बाहुबलियों को नकार दिया था. लेकिन अभी तक बाहबुलियों की पूछ अभी तक कम नहीं हुई है. जब से विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट तेज हुई है. राजनीतिक दल बाहुबलियों के सामने नतमस्तक नजर आ रहे हैं और उनके नेता लगातार बाहुबलियों को अपनी ओर मिलाने में लगे हैं. इसे राजनीति का कौन का चेहरा कहा जाए. वो भी तब जब वोटर बाहुबलियों को नकारने में लगे हैं. आखिर इसकी जमीनी सच्चाई क्या है. क्या राजनीतिक दल वोटरों की धारा से उलट बहना चाह रहे हैं. क्या उन्हें लग रहा है कि बाहुबलियों से ही बात बनेगी. अगर ऐसा होता है. तो बिहार जिस ढर्रे पर आगे बढ़ा था. वहीं, पर फिर से पीछे चला जाएगा. यानि कुछ सालों पहले जैसी ही स्थिति हो जाएगी. क्या इसे स्वीकार करने के लिए लोग तैयार हैं.
इस मुहिम में बिहार का कोई एक दल शामिल नहीं है. आरजेडी और जेडीयू प्रमुख दल हैं. इसलिए इन्हीं की चर्चा ज्यादा हो रही है. शुरुआत जेडीयू से हुई थी. जिसने सीमांचल के दबंग नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री तस्लीमुद्दीन को अपने साथ किया. इसके बाद आरजेडी ने प्रभुनाथ को अपने साथ जोड़कर जेडीयू को जवाब दिया. जेडीयू ने आनंद मोहन की ओर भी तुरप का पत्ता फेंका था. खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आनंद मोहन के गांव गए थे और उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए ये भी कहा था कि अगर आनंद मोहन जेडीयू में आते हैं. तो किसी को क्या परेशानी है. इसी के बाद लालू प्रसाद के दूत बनकर रामकृपाल आनंद मोहन से मुलाकात करने के लिए जेल पहुंचे थे. इसके बाद ददन पहलवान ने आनंद मोहन को साथ लाने की कोशिश की. अब फिर रामकृपाल ने आनंद मोहन से मुलाकात की है. इस बार की मुलाकात साढ़े तीन घंटे की थी. माना जा रहा है कि आनंद मोहन आरजेडी के साथ जा सकते हैं. अगर ऐसा होता है. तो सवाल वही हैं कि आखिर बिहार की राजनीति किस राह पर जा रही है.
Monday, August 9, 2010
नरेंद्र मोदी का साया...
बिहार में बीजेपी-जेडीयू गठबंधन में मोदी पेंच हटने का नाम नहीं ले रहा है. जब भी दोनों दलों में चुनावों की बात होती है. नरेंद्र मोदी की चर्चा अनायास ही शुरू हो जाती है. हालांकि बीजेपी के रुख को देखे. तो लगता है कि उसने तय कर लिया है कि वो बीजेपी विधानसभा चुनाव में प्रचार के लिए नरेंद्र मोदी को नहीं भेजेगी. वरुण गांधी भी बिहार चुनाव में पार्टी के लिए प्रचार नहीं करेंगे. लेकिन बीजेपी के नेता इस बात को खुलकर स्वीकार करना नहीं चाहते हैं. बस पेंच इसी बात का है और इससे निकल रहा है चुनावी मसाला.
इस बार मोदी पेच की शुरुआत रविवार को तब हुई. जब दिल्ली में पार्टी कार्यकारिणी की बैठक के बाद जेडीयू नेता शरद यादव ने कहा कि बिहार में बीजेपी के साथ पुरानी व्यवस्था बहाल रहेगी. इसी के बाद ये बात तय हो गई कि प्रचार के लिए नरेंद्र मोदी बिहार नहीं जाएंगे. इससे खबरिया चैनलों को मसाला मिल गया और हेडलाइन में फिर छा गए नरेंद्र मोदी. जेडीयू के बाद बारी बीजेपी की थी. सो पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि शरद यादव जेडीयू के अध्यक्ष हैं. बीजेपी के नहीं और बीजेपी ये तय करेगी कौन प्रचार के लिए जाएगा और कौन नहीं. लेकिन जावड़ेकर इस बात का कोई जबाव नहीं दे सके. कि मोदी बिहार जाएंगे या फिर नहीं.
इसके बाद बारी बीजेपी नेता राजनाथ सिंह की थी. जो इस सवाल से ही बचते नजर आए. पटना में जब उनसे इस संबंध में सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस सवाल का औचित्य क्या है. अगर उन्हें औचित्य समझ में आएगा. तभी जवाब देंगे. साथ ही राजनाथ ये भी कहते रहे कि जेडीयू ने बीजेपी के सामने कोई शर्त नहीं रखी है. लेकिन राजनाथ भी इस बात का जवाब नहीं दे सके कि मोदी प्रचार के लिए बिहार जाएंगे या फिर नहीं.
बात ज्यादा दिन पुरानी नहीं है. जब मोदी को लेकर जेडीयू और बीजेपी में बात तलाक तक पहुंच गई थी. तब विवाद की जड़ बना साथ नीतीश और मोदी का पोस्टर. जिस पर नीतीश ने सार्वजनिक रूप स नाराजगी जताई और कानूनी कार्रवाई करने की धमकी दी थी. इसके बाद पटना पुलिस ने जांच भी की थी. इससे बिफरी बीजेपी में भी बैठकों का दौर चला. लेकिन बीच बचाव के बाद बीजेपी ने मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया. लेकिन चुनाव की बात शुरू होते ही अब फिर से मोदी का पेंच सामने आ गया है. इस सवाल से बीजेपी कैसे निपटे पार्टी नेता इसकी काट अभी तक नहीं खोज पाए हैं.
इस बार मोदी पेच की शुरुआत रविवार को तब हुई. जब दिल्ली में पार्टी कार्यकारिणी की बैठक के बाद जेडीयू नेता शरद यादव ने कहा कि बिहार में बीजेपी के साथ पुरानी व्यवस्था बहाल रहेगी. इसी के बाद ये बात तय हो गई कि प्रचार के लिए नरेंद्र मोदी बिहार नहीं जाएंगे. इससे खबरिया चैनलों को मसाला मिल गया और हेडलाइन में फिर छा गए नरेंद्र मोदी. जेडीयू के बाद बारी बीजेपी की थी. सो पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि शरद यादव जेडीयू के अध्यक्ष हैं. बीजेपी के नहीं और बीजेपी ये तय करेगी कौन प्रचार के लिए जाएगा और कौन नहीं. लेकिन जावड़ेकर इस बात का कोई जबाव नहीं दे सके. कि मोदी बिहार जाएंगे या फिर नहीं.
इसके बाद बारी बीजेपी नेता राजनाथ सिंह की थी. जो इस सवाल से ही बचते नजर आए. पटना में जब उनसे इस संबंध में सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस सवाल का औचित्य क्या है. अगर उन्हें औचित्य समझ में आएगा. तभी जवाब देंगे. साथ ही राजनाथ ये भी कहते रहे कि जेडीयू ने बीजेपी के सामने कोई शर्त नहीं रखी है. लेकिन राजनाथ भी इस बात का जवाब नहीं दे सके कि मोदी प्रचार के लिए बिहार जाएंगे या फिर नहीं.
बात ज्यादा दिन पुरानी नहीं है. जब मोदी को लेकर जेडीयू और बीजेपी में बात तलाक तक पहुंच गई थी. तब विवाद की जड़ बना साथ नीतीश और मोदी का पोस्टर. जिस पर नीतीश ने सार्वजनिक रूप स नाराजगी जताई और कानूनी कार्रवाई करने की धमकी दी थी. इसके बाद पटना पुलिस ने जांच भी की थी. इससे बिफरी बीजेपी में भी बैठकों का दौर चला. लेकिन बीच बचाव के बाद बीजेपी ने मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया. लेकिन चुनाव की बात शुरू होते ही अब फिर से मोदी का पेंच सामने आ गया है. इस सवाल से बीजेपी कैसे निपटे पार्टी नेता इसकी काट अभी तक नहीं खोज पाए हैं.
Saturday, August 7, 2010
ये रिश्ता क्या कहलाता है
दंबग माने जाने वाले प्रभुनाथ सिंह ने आखिरकार लालू प्रसाद का दामन थाम लिया. कभी धुर लालू के विरोधी रहे प्रभुनाथ सिंह ने नई दोस्ती के लिए अगस्त क्रांति दिवस को चुना था. दोनों के मिलन के गवाह बने सारण क्षेत्र के हजारों लोग जो किसान महापंचायत में शामिल होने के लिए आए थे. लेकिन सवाल ये उठता है कि राजनीति में ये बेमेल जोड़ आखिर क्या गुल खिलाएगा. आखिर लालू में आस्था व्यक्त करनेवाले प्रभुनाथ सिंह किस तरह से आरजेडी के लिए वोट मांगेंगे. सवाल ये कि...ये रिश्ता क्या कहलाएगा.
बिहार की राजनीति में भी इसकी चर्चा हो रही है. प्रभुनाथ सिंह खुद के आरजेडी में शामिल होने को जनता की आवाज़ बता रहे हैं. लेकिन वास्तव में क्या ऐसा है. तो जवाब मिलता है. नहीं. क्योंकि प्रभुनाथ सिंह जिस तेवर के नेता माने जाते हैं. उसमें इसकी गुंजाइश काफी कम है. हालांकि सारण इलाके में उनका खासा वर्चस्व है और इसका असर भी बिहार विधानसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है. लेकिन लालू और प्रभुनाथ की दोस्ती बहुत दिनों तक चल पाएगी.
आखिर ये सवाल क्यों उठ रहा है. कि लालू-प्रभुनाथ की दोस्ती बेमेल है. तो इसके पीछे एक वजह है. दोनों के अपने राजनीतिक सरोकार. प्रभुनाथ सिंह अभी तक अपनी शर्तों पर राजनीति करते आए हैं. इसको लेकर उनकी आलोचना भी होती रही है और वो किसी बात को बहुत बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं. इस बारे में भी लोग जानते हैं. जबकि लालू की राजनीति इससे बिल्कुल अलग है. वो आरजेडी में नेताओं को अपनी शर्तों पर रखते हैं और जो भी इससे सहमत नहीं होता है. वो या तो खुद अलग हो जाता है या हासिए पर चला जाता है. शिवानंद तिवारी इसके अच्छे उदाहरण हैं. जिन्होंने आरजेडी में दोनो दौर देखे हैं. फिलहाल वो जेडीयू में हैं.
ऐसे में लालू और प्रभुनाथ का साथ चुनावी फायदे के लिए जरूर दिखता है. अगर चुनाव में सफलता मिलती है. तो दोनों नेता कुछ दिनों तक साथ चल सकते हैं. और अगर चुनाव में आपेक्षित लाभ नहीं मिला. तो इस दोस्ती का हश्र क्या होगा. इसका अंदाजा बहुत आसानी से लगाया जा सकता है. यही नहीं लालू प्रसाद से दोस्ती की बात करें. तो बड़े भाई-छोटे भाई के रूप में बिहार चुनाव में उतरने की तैयारी कर रहे पासवान से उनकी दोस्ती पर ग्रहण लगा हुआ है. इसका हश्र क्या होगा. इसको लेकर सवाल उठने लगे हैं. क्योंकि पासवान ने खुद को उस महापंचायत से दूर रखा. जिसमें उन्हें लालू प्रसाद के साथ जाना था. और इस दूरी की वजह सीट बटवारे को लेकर उपजा विवाद माना जा रहा है.
पासवान का मामला तो ताजा है. अगर इतिहास की बात करें. तो लालू प्रसाद बिहार की सत्ता में आने के बाद वामदलों और कांग्रेस जैसी पार्टियों से दोस्ती कर चुके हैं. लेकिन किसी भी भी राजनीति लालू से दोस्ती के बाद सिरे नहीं चढ़ पाई. दहाई में रहनेवाले वामदल मुश्किल से बिहार विधानसभा में खाता खोल पा रहे हैं. लोकसभा में तो इस पर भी ग्रहण लग गया है.
कभी बिहार में राज करनेवाली कांग्रेस लालू प्रसाद की पिछलग्गू बन गई. कांग्रेस का भी जनाधार बद से बदतर की स्थिति में पहुंच गया. लालू प्रसाद से अलग होकर अब कांग्रेस और वामदल फिर से अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में प्रभुनाथ और लालू की दोस्ती के मायने आसानी से समझे जा सकते हैं।
बिहार की राजनीति में भी इसकी चर्चा हो रही है. प्रभुनाथ सिंह खुद के आरजेडी में शामिल होने को जनता की आवाज़ बता रहे हैं. लेकिन वास्तव में क्या ऐसा है. तो जवाब मिलता है. नहीं. क्योंकि प्रभुनाथ सिंह जिस तेवर के नेता माने जाते हैं. उसमें इसकी गुंजाइश काफी कम है. हालांकि सारण इलाके में उनका खासा वर्चस्व है और इसका असर भी बिहार विधानसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है. लेकिन लालू और प्रभुनाथ की दोस्ती बहुत दिनों तक चल पाएगी.
आखिर ये सवाल क्यों उठ रहा है. कि लालू-प्रभुनाथ की दोस्ती बेमेल है. तो इसके पीछे एक वजह है. दोनों के अपने राजनीतिक सरोकार. प्रभुनाथ सिंह अभी तक अपनी शर्तों पर राजनीति करते आए हैं. इसको लेकर उनकी आलोचना भी होती रही है और वो किसी बात को बहुत बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं. इस बारे में भी लोग जानते हैं. जबकि लालू की राजनीति इससे बिल्कुल अलग है. वो आरजेडी में नेताओं को अपनी शर्तों पर रखते हैं और जो भी इससे सहमत नहीं होता है. वो या तो खुद अलग हो जाता है या हासिए पर चला जाता है. शिवानंद तिवारी इसके अच्छे उदाहरण हैं. जिन्होंने आरजेडी में दोनो दौर देखे हैं. फिलहाल वो जेडीयू में हैं.
ऐसे में लालू और प्रभुनाथ का साथ चुनावी फायदे के लिए जरूर दिखता है. अगर चुनाव में सफलता मिलती है. तो दोनों नेता कुछ दिनों तक साथ चल सकते हैं. और अगर चुनाव में आपेक्षित लाभ नहीं मिला. तो इस दोस्ती का हश्र क्या होगा. इसका अंदाजा बहुत आसानी से लगाया जा सकता है. यही नहीं लालू प्रसाद से दोस्ती की बात करें. तो बड़े भाई-छोटे भाई के रूप में बिहार चुनाव में उतरने की तैयारी कर रहे पासवान से उनकी दोस्ती पर ग्रहण लगा हुआ है. इसका हश्र क्या होगा. इसको लेकर सवाल उठने लगे हैं. क्योंकि पासवान ने खुद को उस महापंचायत से दूर रखा. जिसमें उन्हें लालू प्रसाद के साथ जाना था. और इस दूरी की वजह सीट बटवारे को लेकर उपजा विवाद माना जा रहा है.
पासवान का मामला तो ताजा है. अगर इतिहास की बात करें. तो लालू प्रसाद बिहार की सत्ता में आने के बाद वामदलों और कांग्रेस जैसी पार्टियों से दोस्ती कर चुके हैं. लेकिन किसी भी भी राजनीति लालू से दोस्ती के बाद सिरे नहीं चढ़ पाई. दहाई में रहनेवाले वामदल मुश्किल से बिहार विधानसभा में खाता खोल पा रहे हैं. लोकसभा में तो इस पर भी ग्रहण लग गया है.
कभी बिहार में राज करनेवाली कांग्रेस लालू प्रसाद की पिछलग्गू बन गई. कांग्रेस का भी जनाधार बद से बदतर की स्थिति में पहुंच गया. लालू प्रसाद से अलग होकर अब कांग्रेस और वामदल फिर से अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में प्रभुनाथ और लालू की दोस्ती के मायने आसानी से समझे जा सकते हैं।
'कुछ कर दिखाना है'
अमरेश राय इन दिनों दिल्ली के पॉश इलाके साउथ एक्सटेंशन-2 में रहते हैं. वहीं, एक भाई साहब के साथ मिलकर अपनी कंपनी. जो छात्रों के विदेश में पढ़ने भेजती है. उनके व्यक्तित्व का विकास करती है. उसे सिरे चढ़ाने की कोशिशों में लगे हैं. भाई अमरेश के मन में छटपाहट है. देश और समाज के लिए कुछ कर गुजरने की. जितनी बार बात होती है. ये टीस उनकी बातों में झलकती है. देश और दुनिया में क्या चल रहा है. वो उस पर पैनी नजर रखते हैं और जैसे ही कोई बात को और विस्तार में समझना होता है या फिर किसी चीज पर राय लेनी होती है. तुरंत फोन खटखटा देते हैं. फिर बेबाक राय का सिलसिला शुरू होता है. हालांकि इससे समाज और देश का कोई भला नहीं होता है. लेकिन उसकी भूमिका में एक कदम और जरूर जुड़ता है. ऐसा मेरा मानना है.
अमरेश राय से मुलाकात इलहाबाद में 1992 में हुई. बस्ती के खलीलाबाद से मेडिकल की तैयारी का सपना लेकर इलाहाबाद आए अमरेश एक कोचिंग सेंटर के हॉस्टल में रहते थे. वहीं, पास ही हमारे कुछ अन्य मित्र थे. जिनका राय साहब से आते-जाते परिचय हो गया था. एक दिन हम भी उन्हीं लोगों के साथ राय साहब के कमरे पर पहुंचा और फिर वहीं, से मुलाकात और एक-दूसरे के बारे में जानने का सिलसिला शुरू हुआ. जो अभी तक जारी है. हम एक-दूसरे को अब भी समझ रहे हैं.
मेडिकल की पढ़ाई में मन नहीं लगा. मन से उद्यमी राय साहब ने इलाहाबाद से दिल्ली के लिए उड़ान भर दी. दिल्ली में रहते हुए राय साहब ने कई काम किए. उस समय शायद नियति को मंजूर नहीं था. कि राय साहब दिल्ली में तरक्की करें. सो पेट की गंभीर बीमारी का शिकार हो गए और जो ताना बाना बुना था. वो एक झटके में खत्म हो गया और राय साहब फिर गोरखपुर की पथरीली जमीन पर पहुंच गए. वहीं, से फिर नया दौर शुरू हुआ. शिक्षा के क्षेत्र में कुछ कर गुजरने का. इसमें राय साहब सफल भी हुए और जल्द गोरखपुर में अंग्रेजी भाषा पढ़ानेवाले अच्छे शिक्षकों में से एक बन गए. लेकिन राय साहब की मंजिल गोरखपुर नहीं थी. सो हैदराबाद पहुंच गए. जहां से उन्होंने छात्रों को विदेश में पढ़ाई के लिए भेजने का सिलसिला शुरू किया. जो अभी तक जारी है और दिनों दिन उसका करवां बढ़ता जा रहा है. राय साहब भले ही अभी तक अपनी पहचान उस स्तर पर नहीं बना पाए हैं. जिसके लिए वो प्रयासरत हैं. क्योंकि इसके आड़े में आ रहा है धन. जो अभी उनके पास नहीं है. लेकिन इतना जरूर है कि शाम को भूखे नहीं सोना पड़ता है. अपने साथ परिवार और आसपास के लोगों का खासा ख्याल राय साहब रखते हैं. उनमें से एक मैं भी हूं. जो उनकी कृपा को शायद अपने अंतिम समय तक नहीं भुला सकता. ये तो व्यक्तिगत बात हुई. लेकिन जुड़ी राय साहब के सरोकार से है. इसलिए इसका उल्लेख जरूरी था.
राय साहब के मन में देश के लिए कुछ कर गुजरने का कीड़ा चल रहा है. जिसका जिक्र मैं पहले भी कर चुका हूं. आज सुबह की ही बात है. राय साहब का फोन आया और कहने लगे. कि बॉस मैं शांति से इस दुनिया से नहीं जाना चाहता हैं. ऐसा कुछ करना चाहता हूं. जिसके बारे में लोग सोचें और बोले. ऐसा काम जो अच्छा हो और देश को आगे बढ़ाए. ये सब राय साहब अन्य लोगों की तरह अमर होने के लिए नहीं कह रहे हैं. लेकिन उनकी एक सोच रही है. कि कुछ करना चाहिए. पर अभी तक राय साहब को वो मंच नहीं मिला है. जिसकी तलाश उन्हें है. लेकिन जिस तरह से वो अपने मिशन में जुटे हैं. हमें उम्मीद ही नहीं...विश्वास है कि उन्हें जल्द ही वो मिलेगा.
अमरेश राय से मुलाकात इलहाबाद में 1992 में हुई. बस्ती के खलीलाबाद से मेडिकल की तैयारी का सपना लेकर इलाहाबाद आए अमरेश एक कोचिंग सेंटर के हॉस्टल में रहते थे. वहीं, पास ही हमारे कुछ अन्य मित्र थे. जिनका राय साहब से आते-जाते परिचय हो गया था. एक दिन हम भी उन्हीं लोगों के साथ राय साहब के कमरे पर पहुंचा और फिर वहीं, से मुलाकात और एक-दूसरे के बारे में जानने का सिलसिला शुरू हुआ. जो अभी तक जारी है. हम एक-दूसरे को अब भी समझ रहे हैं.
मेडिकल की पढ़ाई में मन नहीं लगा. मन से उद्यमी राय साहब ने इलाहाबाद से दिल्ली के लिए उड़ान भर दी. दिल्ली में रहते हुए राय साहब ने कई काम किए. उस समय शायद नियति को मंजूर नहीं था. कि राय साहब दिल्ली में तरक्की करें. सो पेट की गंभीर बीमारी का शिकार हो गए और जो ताना बाना बुना था. वो एक झटके में खत्म हो गया और राय साहब फिर गोरखपुर की पथरीली जमीन पर पहुंच गए. वहीं, से फिर नया दौर शुरू हुआ. शिक्षा के क्षेत्र में कुछ कर गुजरने का. इसमें राय साहब सफल भी हुए और जल्द गोरखपुर में अंग्रेजी भाषा पढ़ानेवाले अच्छे शिक्षकों में से एक बन गए. लेकिन राय साहब की मंजिल गोरखपुर नहीं थी. सो हैदराबाद पहुंच गए. जहां से उन्होंने छात्रों को विदेश में पढ़ाई के लिए भेजने का सिलसिला शुरू किया. जो अभी तक जारी है और दिनों दिन उसका करवां बढ़ता जा रहा है. राय साहब भले ही अभी तक अपनी पहचान उस स्तर पर नहीं बना पाए हैं. जिसके लिए वो प्रयासरत हैं. क्योंकि इसके आड़े में आ रहा है धन. जो अभी उनके पास नहीं है. लेकिन इतना जरूर है कि शाम को भूखे नहीं सोना पड़ता है. अपने साथ परिवार और आसपास के लोगों का खासा ख्याल राय साहब रखते हैं. उनमें से एक मैं भी हूं. जो उनकी कृपा को शायद अपने अंतिम समय तक नहीं भुला सकता. ये तो व्यक्तिगत बात हुई. लेकिन जुड़ी राय साहब के सरोकार से है. इसलिए इसका उल्लेख जरूरी था.
राय साहब के मन में देश के लिए कुछ कर गुजरने का कीड़ा चल रहा है. जिसका जिक्र मैं पहले भी कर चुका हूं. आज सुबह की ही बात है. राय साहब का फोन आया और कहने लगे. कि बॉस मैं शांति से इस दुनिया से नहीं जाना चाहता हैं. ऐसा कुछ करना चाहता हूं. जिसके बारे में लोग सोचें और बोले. ऐसा काम जो अच्छा हो और देश को आगे बढ़ाए. ये सब राय साहब अन्य लोगों की तरह अमर होने के लिए नहीं कह रहे हैं. लेकिन उनकी एक सोच रही है. कि कुछ करना चाहिए. पर अभी तक राय साहब को वो मंच नहीं मिला है. जिसकी तलाश उन्हें है. लेकिन जिस तरह से वो अपने मिशन में जुटे हैं. हमें उम्मीद ही नहीं...विश्वास है कि उन्हें जल्द ही वो मिलेगा.
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